जनसंख्या परिवर्तन एवं जीवन स्तर में जल संसाधन की भूमिका
(दुर्ग एवं धमधा विकासखंड के विशेष संदर्भ में)
चेतना गजपाल1, डॉ. कुबेर सिंह गुरुपंच2
1शोधार्थी (पीएचडी)़, भूगोल विभाग,
शासकीय विश्वनाथ यादव तामस्कर स्नातकोत्तर स्वशासी महाविद्यालय, दुर्ग ;छ.ग.द्ध
2निर्देषक, हेमचंद यादव विश्वविद्यालय, दुर्ग ;छ.ग.द्ध
*Corresponding Author E-mail: chetnagajpal@gmail.com
ABSTRACT:
किसी भी देश की जनसंख्या में परिवर्तन वहाँ की आर्थिक स्वरूप पर निर्भर करता है। छत्तीसगढ़ एक कृषि प्रधान राज्य है, जहाँ के अधिकांश जनसंख्या कृषि पर निर्भर रहती हैैै। कृषि के लिए अधिकतर किसान मानसून पर निर्भर रहते है, जिन क्षेत्रों में वर्ष भर जल की उपलब्धता रहती है, वहाँ साल में दो फसल पैदा करने की क्षमता बढ़ जाती है। प्रस्तुत अध्ययन का उद्देश्य जनसंख्या परिवर्तन एवं जीवन स्तर में जल संसाधन की भूमिका का अध्ययन करना, जनसंख्या परिवर्तन एवं जीवन स्तर से जल संसाधन में प्रभावों का अध्ययन करना एवं जनसंख्या परिवर्तन एवं जीवन स्तर में जलसंसाधन के प्रति लोगों को जागरूक करना। अध्ययन क्षेत्र छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के अंतर्गत दुर्ग एवं धमधा विकासखंड का चयन किया गया है, जिनमें जलसंसाधन के कारण जनसंख्या में परिवर्तन एवं जीवन स्तर पर पड़ने वाले प्रभाव का विश्लेषणात्मक अध्ययन किया गया हैैै। दुर्ग जिले की जनसंख्या वर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार 1503146 है। एवं 2011 की जनगणना के अनुसार 1721948 है जिसका 10 वर्षीय जनसंख्या वृद्धि (प्रतिशत में) 14.56 प्रतिषत आंका गया है। इसी प्रकार दुर्ग जिले के अंतर्गत विकासखंड में दुर्ग की जनसंख्या 2001 की जनगणना के अनुसार 997848 है। 2011 की जनगणना के अनुसार 1126731 है, जिसका 10 वर्षीय जनसंख्या वृद्धि (प्रतिशत में) 12.91 प्रतिषत आंका गया है। धमधा विकासखंड की जनसंख्या 2001 की जनगणना के अनुसार 223087 है 2011 की जनगणना के अनुसार 269990 है। 10 वर्षीय जनसंख्या वृद्धि (प्रतिशत में) 21.02 प्रतिषत आंका गया है। जो कि जनसंख्या परिवर्तन को दर्शाती है। इसमे जलसंसाधन की अहम भूमिका देखी जा सकती है।
KEYWORDS: जनसंख्या, परिवर्तन, जीवन स्तर, जल, संसाधन।
प्रस्तावना -
वर्तमान समय में जनसंख्या में परिवर्तन एवं जीवन स्तर के विकास में सिंचाई, ऊर्जा, सुरक्षित पेयजल प्रदाय में उन्नति हेतु जल प्रबंधन चुनौतीपूर्ण है। छत्तीसगढ़ के अस्तित्व के हर पहलू में जल निर्णायक भूमिका है इसलिए यहाँ का बहुमूल्य संसाधन जल है। घरेलू, कृषि और औद्योगिक उपयोग के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्रोत के रूप में उपलब्ध है।
छत्तीसगढ़ की 80 प्रतिषत जनसंख्या कृषि पर तथा कृषि आधारित अपनी जीविका के स्त्रोतों पर निर्भर रहता है। यहाँ अन्य राज्यों की तुलना में वर्षा जल पर्याप्त मात्रा में प्राप्त हो जाती है। यहाँ औसत वार्षिक वर्षा 1052 मिलीमीटर है, जिसमें से 15 जून से सितंबर तक कुल वर्षा का 80 प्रतिषत मानसून के मौसम में प्राप्त होता है, परंतु प्रत्येक तीसरे वर्ष में वर्षा का असमान वितरण, अनिश्चितकालीन एवं स्थानीक परिवर्तन में भिन्नता के कारण कृषि उत्पादन को प्रभावित करता है और सूखे का खतरा बना रहता ळें
छत्तीसगढ़ राज्य में जनसंख्या में परिवर्तन एवं जीवन स्तर को प्रभावित करने के लिए महानदी, शिवनाथ नदी, इंद्रावती, अरपा, हसदेव, केलो, सोन एवं कन्हार कुछ प्रमुख नदियां सम्मिलित हैं, जिनसे मानसून के बाद व पहले कृषि उत्पादन में जलापूर्ति होती रहती है। मानसून के दौरान प्रायः नदियों में 90 प्रतिषत वार्षिक प्रवाह होता है जो जल का उच्च प्रवाह होता है। जिनसे सतही जल के स्त्रोतों जैसे जलाशयों,बांधो में जल भंडारण की आवश्यकता की पूर्ति होती हैं। जिनसे नदी के तटीय क्षेत्रों के अलावा पूरे राज्य में जलापूर्ति होती रहती है। इन भागो में यद्यपि जनसख्या परिवर्तन अधिक पाई जाती है।
पिछले एक दशक से जहाँ एक ओर राज्य कृषि सभ्यता से औद्योगिक सभ्यता की ओर तेजी से बढ़ रहा है। जिससे जल की आवश्यकता में भी वृद्धि हो रही है, वहीं दूसरी ओर जलापूर्ति की समस्या भी उभरती जा रही है। जिले में जल आपूर्ति की योजनाओं ने भी बल पकड़ लिया है उसके लिए जलाशयों की बढ़ती मांग की पूर्ति हेतु नरवा योजना और अनेक योजनाएं स्वरूप ले चुकी है। स्टॉपडेमों और एनिकेट की संख्या में वृद्धि हुई है।
शोध का उद्देश्य -
1. जनसंख्या परिवर्तन एवं जीवन स्तर में जल संसाधन की भूमिका का अध्ययन करना।
2. जनसंख्या परिवर्तन एवं जीवन स्तर से जल संसाधन में प्रभावों का अध्ययन करना।
3. जनसंख्या परिवर्तन एवं जीवन स्तर में जल संसाधन के प्रति लोगों को जागरूक करना।
अध्ययन क्षेत्र की सामान्य जानकारी -
शिवनाथ नदी के पूर्वी तट पर स्थित दुर्ग जिला 20ं 51’से 22ं 02’ उत्तर अक्षांश तक तथा 81ं 80’ से 81ं 37’ पूर्व देशांतर तक 2319.99 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र फल में विस्तृत है। जिले की समुद्र तल से ऊंचाई 317 मीटर है। दुर्ग जिले का निर्माण 1906 में हुआ था। 2011 के आंकड़ों के अनुसार जिले की कुल जनसंख्या 17,21,948 है। छत्तीसगढ़ के औद्योगिक विकास के साथ-साथ सांस्कृतिक विविधता, सामाजिक समरसता और संसाधनों के सार्थक उपयोग का अग्रदूत है। छत्तीसगढ़ की प्रतिष्ठा और गौरव का प्रतीक है दुर्ग। दुर्ग जिला मुख्य रूप से कृषि पर निर्भर है, दुर्ग एक सिंचित जिला है जहाँ खरीफ एवं रबी दोनों फसल बोई जाती है। विकासखंड, 3 तहसील एवं 6 विधानसभा क्षेत्र है।
शोध क्षेत्र -
दुर्ग जिले में तीन विकासखंड धमधा, पाटन एवं दुर्ग है। शोध क्षेत्र में दुर्ग जिले के दो विकासखंड दुर्ग एवं धमधा को लिया गया है। जिनमें से दुर्ग विकासखंड जिनका कुल क्षेत्रफल 675.17 वर्ग किलोमीटर है जिसमें 423.51 वर्गकिलोमीटर ग्रामीण क्षेत्र व 215.91 वर्ग किलोमीटर शहरी क्षेत्र शामिल हैं इसकी जनसंख्या 11,26,731 है। जिसमें से शहरी जनसंख्या 9,26,035 है जबकि ग्रामीण जनसंख्या 2,00,696 है। इसका जनसंख्या घनत्व 1668 निवासी प्रति वर्ग किलोमीटर है। इसी प्रकार धमधा विकासखंड जो गोंडवाना राजवंश का प्राचीन गढ था, आज ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक स्थल के रूप में जाना जाता है। शहर का प्राचीन नाम “धर्मधाम” था लेकिन समय के साथ यह धर्मधाम से धर्मदा, फिर धमदा और अंत में धमधा में बदलता रहा। यह 21.45°उत्तरसे 81.32°पूर्व पर स्थित है। इसका कुल क्षेत्रफल 882.49 वर्ग किलोमीटर है। इसकी जनसंख्या 2,69,990 है। जिसमें से शहरी जनसंख्या 65,730 है जबकि ग्रामीण जनसंख्या 2,04,260 है। इसका जनसंख्या घनत्व 306 निवासी प्रतिवर्ग किलोमीटर है। दोनों विकास खंडों की प्रमुख नदी शिवनाथ नदी है।
शोध विधि तंत्र -
प्रस्तुत शोध पत्र में मुख्य रूप से प्राथमिक और द्वितीयक दोनों प्रकार के आंकड़ों की सहायता ली गई है। अध्ययन क्षेत्र दुर्ग जिले के दुर्ग विकासखंड और धमधा विकासखंड के जनसंख्यात्मक स्वरूप एवं जीवन स्तर पर जल संसाधन के प्रभाव से संबंधित सूचनाएँ जनसांख्यिकी विभाग दुर्ग एवं जल संसाधन कार्यालय दुर्ग से प्राप्त किया गया है। इनके अतिरिक्त पत्र-पत्रिकाओं, समाचार-पत्रों, पुस्तकों, की भी समीक्षा की गई है। साथ ही इंटरनेट की सहायता ली गई है। यहाँ पर दोनों विकासखंडों की जनसंख्या संबंधी आंकड़े वर्ष 2001 एवं 2011 के प्रस्तुत किए गए हैं। प्राप्त आंकड़ों का सांख्यिकी विधि से अवलोकनात्मक, तुलनात्मक एवं विश्लेषणात्मक अध्ययन पद्धतियों का उपयोग किया गया है।
दुर्ग जिले के दोनों विकासखंडों की भोगौलिक, प्रशासनिक, सामाजिक, जनांकिकी संरचना -
’’किसी भी क्षेत्र की जनसंख्या परिवर्तन उसके क्षेत्रीय विकास सामाजिक जागरूकता, सांस्कृतिक आधार, ऐतिहासिक, राजनीतिक विचारधारा के सूचक होती है‘‘(चांदना, 1980)। जनसंख्या परिवर्तन के प्रमुख कारक साक्षरता, सामाजिक, आर्थिक विकास एवं प्रवास भी माने जाते हैं।
मानव स्वयं ही प्राकृतिक वस्तुओं का उपभोक्ता एवं उत्पादक होने के कारण ही सामाजिक व क्षेत्रीय विकास में प्रमुख भूमिका निभाता है इसलिए किसी भी क्षेत्र की जनसंख्या के अध्ययन से ही उसके विकास की दिशा व गति के आधार पर भावी विकास की संभावनाओं का पता लगता है।
सारणी-1 सामान्य जानकरी जनगणना समंक (संदर्भ वर्ष 2011)
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675-17 |
1126731 |
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269990 |
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Continue Table
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1 |
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75-24 |
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1 |
0 |
0 |
2 |
6 |
172097 |
63-74 |
सारिणी 1. से स्पष्ट है कि दुर्ग जिले के दुर्ग विकासखण्ड धमधा की भौगोलिक एवं प्रशासनिक संरचना का मूल्यांकन किया गया है जिसके अंतर्गत यह ज्ञात होता है कि दुर्ग विकासखंड धमधा की तुलना में क्षेत्रफल में कम है एवं जनसंख्या की दृष्टि से दुर्ग धमधा से अधिक है। भौगोलिक क्षेत्रफल की दृष्टि से दुर्ग विकासखंड 675.17 प्रति वर्ग किलोमीटर एवं धमधा विकासखंड 882.49 है। दोनो विकासखंडो के कुल ग्रामों की संख्या क्रमशः 80 एवं 162 है इसी प्रकार ग्राम पंचायत क्रमशः 70 व 95 है, जनपद पंचायत क्रमशः 1 व 1 है। इसी क्रम में नगर निगम नगरपालिका केवल दुर्ग विकासखंड में क्रमशः 2, 1 है। नगरपंचायत क्रमशः 1, 2 है जनगणना समंक 2011 के अनुसार प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र दुर्ग में 11 व धमधा 6 है, कुल जनसंख्या दुर्ग की 11,26,731 व धमधा की 2,69,990 है। दुर्ग की कुल शिक्षित जनसंख्या 8,47,787 जो कि प्रतिशत में 75.24 प्रतिषत है। धमधा विकासखंड की कुल शिक्षित जनसंख्या 1,72,097 जो कि प्रतिशत में 63.74 प्रतिषत दर्शाया गया है।
सारणी-2 तहसीलवार जनसंख्या, दसवर्षीय जनसंख्या वृद्धि, घनत्व एवं लिंगानुपात
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2001 |
2011 |
2001 |
2011 |
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770970 |
732176 |
1503146 |
875813 |
846135 |
1721948 |
13-6 |
15-56 |
14-56 |
647 |
742 |
950 |
966 |
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516569 |
481279 |
997848 |
576597 |
550134 |
1126731 |
11-62 |
14-31 |
12-91 |
1478 |
1668 |
932 |
954 |
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2- |
/ke/kk |
111443 |
111644 |
223087 |
135480 |
134510 |
269990 |
21-57 |
20-48 |
21-02 |
253 |
306 |
1002 |
993 |
सारणी-2 में दुर्ग जिले के अंतर्गत दुर्ग व धमधा विकासखंड की विकासखंडवार जनसंख्या,दसवर्षीय जनसंख्या वृद्धि, घनत्व तथा लिंगानुपात प्रस्तुत है। दुर्ग विकासखंड की जनसंख्या 2001 की जनगणना के अनुसार 9,97,848 है, जिसमें पुरुषों की संख्या 5,16,569 व स्त्रियों की संख्या 4,81,279 है एवं 2011 की जनगणना के अनुसार 11,26,731 है, जिसमें पुरुषों की संख्या 5,76,597 व स्त्रियों की संख्या 5,50,134 है, जिसका 10 वर्षीय जनसंख्या वृद्धि (प्रतिशत में) पुरुषों की 11.62 प्रतिषत व स्त्रियों की 14.31 प्रतिषत तथा कुल 12.91 प्रतिषत आंका गया है। जनसंख्या घनत्व प्रतिवर्ग किलोमीटर में 2001 में 1478 एवं 2011 में 1668 है। लिंगानुपात की दृष्टि से 2001 में 932 एवं 2011 में 954 है। और धमधा विकासखंड की जनसंख्या 2001 की जनगणना के अनुसार 2,23,087 है, जिसमें पुरुषों की संख्या 1,11,443 व स्त्रियों की संख्या 1,11,644 है एवं 2011 की जनगणना के अनुसार 2,69,990 है जिसमें पुरुषों की संख्या 1,35,480 व स्त्रियों की संख्या 1,34,510 है, जिसका 10 वर्षीय जनसंख्या वृद्धि (प्रतिशत में) पुरुषों की 21.57 प्रतिषत व स्त्रियों की 20.48 प्रतिषत तथा कुल 21.02 प्रतिषत आंका गया है। जनसंख्या घनत्व प्रतिवर्ग किलोमीटर में 2001 में 253 एवं 2011 में 306 है। लिंगानुपात की दृष्टि से 2001 में 1002 एवं 2011 में 993 है। जो कि जनसंख्या परिवर्तन को दर्शाती है। जनसंख्या वृद्धि दर के आधार पर ज्ञात होता है कि दुर्ग विकासखंड की तुलना में धमधा विकासखंड में धनात्मक जनसंख्या परिवर्तन या वृद्धि हुई है। इसी प्रकार जनसंख्या घनत्व व लिंगानुपात में भी धनात्मक जनसंख्या परिवर्तन या वृद्धि हुई है।
सारणी-3 कृषि एवं सम्बद्ध सेवायें
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147146 |
43291 |
190437 |
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67517 |
22021 |
33548 |
10946 |
44494 |
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2- |
/ke/kk |
88204 |
9974 |
53949 |
15456 |
69405 |
सारणी-3 के अनुसार दोनो विकासखंडों की कृषि एवं संबधित सेवाओं के अंतर्गत भूमि उपयोग एवं फसलों का क्षेत्रफल (हेक्टरमे) के सन्दर्भ मे है। दुर्ग विकासखंड मे क्षेत्रफल ग्रामीण पत्रक के अनुसार 67517 प्रतिहेक्टर में, कृषि के लिए जो भूमि उपलब्ध नहीं मे 22021 है। इसी तरह फसलों का क्षेत्रफल मे निरा क्षेत्रफल 33548 प्रतिहेक्टर मे, द्विफसली क्षेत्र 10946 प्रति हेक्टर में एवं कुल क्षेत्रफल 44494 प्रतिहेक्टर मे है। इसी प्रकार धमधा विकासखंड मे क्षेत्रफल ग्रामीण पत्रक के अनुसार 88204 प्रतिहेक्टर में, कृषि के लिए जो भूमि उपलब्ध नहीं मे 9974 प्रतिहेक्टर में है। इसी तरह फसलों का क्षेत्रफल मे निरा क्षेत्रफल 59649 प्रतिहेक्टर मे, द्विफसली क्षेत्र 16889 प्रतिहेक्टर में एवं कुल क्षेत्रफल 76538 प्रतिहेक्टर मे है।
सारणी-4 खरीफ एवं रबी फसलों के अंतर्गत सकल क्षेत्र हेक्टेयर में
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38741 |
510114 |
266756 |
9547 |
276303 |
786417 |
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33099 |
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2- |
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55243 |
99 |
55342 |
21173 |
23 |
21196 |
76538 |
सारणी-4 में दुर्ग जिले के दोनों विकासखंडों की खरीफ एवं रबी फसलों के अंतर्गत सकल क्षेत्र (हेक्टेयर में) ज्ञात किया गया है। जिसके अंतर्गत दुर्ग विकासखंड की खरीफ फसलों में खाद्य फसलें 33099 प्रतिहेक्टेयर में एवं अखाद्य फसलें उपलब्ध नहीं है। जिनका योग 33099 प्रति हेक्टेयर में है। इसी प्रकार धमधा विकासखंड में खरीफ की फसलों में खाद्य फसलें 55243 प्रति हेक्टेयर में एवं अखाद्य फसलें 99 प्रति हेक्टेयर में हैं जिनका योग 55342 प्रति हेक्टेयर में है। दुर्ग विकासखंड की रबी फसलों में खाद्यफसलें 11309 प्रति हेक्टेयर में एवं अखाद्य फसलें 86 प्रतिहेक्टेयर में है जिनका योग 11395 प्रतिहेक्टेयर में है। इसीप्रकार धमधा विकासखंड की खाद्य फसलें 21173 प्रति हेक्टेयर में एवं अखाद्य फसलें 23 प्रति हेक्टेयर में हैं जिनका योग 21196 प्रति हेक्टेयर में है। जिनका महायोग दुर्ग का 44494 प्रति हेक्टेयर में एवं धमधा का 76538 प्रति हेक्टेयर में है जिनसे स्पष्ट है कि दुर्ग की तुलना में धमधा में अधिक फसल उत्पादन होता है।
जनसंख्या परिवर्तन एवं जीवन स्तर में जल संसाधन की भूमिका -
लोग पीने, नहाने, खाना पकाने कपड़े धोने में पानी का उपयोग करता है। जल का उपयोग उत्पाद बनाने के लिए, कृषि उद्योग द्वारा भोजन प्रदान करने के लिए, ऊर्जा उद्योग द्वारा रौशनी प्रदान करने के लिए किया जाता है। व्यक्तियों द्वारा प्रत्यक्ष रूप से उपयोग किए जाने वाले पानी की मात्रा विभिन्न मानवीय विशेषताओं जैसे आयु शिक्षा सांस्कृतिक पृष्ठभूमि धार्मिक विश्वास और वित्तीय स्थिति से संबंधित है। एक विशिष्ट क्षेत्र में जल स्रोत पानी की मात्रा गुणवत्ता में एक निश्चित समय पर और उनकी दर और आपूर्ति के समय में भिन्न होते हैं। जनसंख्या वृद्धि को पूरा करने के लिए अनुमानित निकासी जल स्रोतों की क्षमता से अधिक हो जाती है जिसे पूरा करने के लिए कहा जा सकता है कि नए स्रोतों को विकसित किया जाना चाहिए यदि यह संभव है। पानी के उपयोग में कटौती की आवश्यकता होगी फिर भी मांगों को केवल तब तक कम किया जा सकता है, जब तक की कमी से सार्वजनिक स्वास्थ्य को खतरा न हो, पर्यावरण को नुकसान न हो,या क्षेत्र की अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़ा हो।
सरकारी योजनाओं के अंतर्गत जल संसाधन की भूमिका जनसंख्यात्मक परिवर्तन में अत्यधिक प्रभाव डालता है क्योंकि दोनो ही विकासखंड छत्तीसगढ़ के अग्रणी कृषि क्षेत्रों में महत्वपूर्ण स्थान रखता है इसलिए यहां सरकार द्वारा जल संसाधनों के विभिन्न योजनाओं के रूप में स्टापडैम और एनीकट का निर्माण किया गया है। जिसके अंतर्गत दुर्ग विकासखंड में 815 प्रति हेक्टेयर में एनीकेट से सिंचाई प्रस्तावित की गई है एवं 19.02 मि.घन मी जल भंडारण क्षमता है जो कुल 38 गावों में जलापूर्ति करती है। इसीप्रकार धमधा विकासखंड में 935 प्रति हेक्टेयर में एनीकेट से सिंचाई प्रस्तावित की गई है एवं 17.95 मि.घन मी जल भंडारण क्षमता है जो कुल 23 गावों में जलापूर्ति करती है।
दुर्ग जिले के दोनों विकास खंडों के जलाशयों में जलभराव की जानकारी वर्ष 2022 के अनुसार दर्ज की गयी है जिसमें जलापूर्ति हेतू लघु जलाशयों का निर्माण एवं इसके अंतर्गत में दुर्ग विकासखंड में 7.425 मि.घन मी. रूपांकित जलभराव क्षमता के साथ 2022 की स्थिति में जल भराव 6.057 मि.घन मी. एवं 82 प्रतिषत जलभराव आंका गया है। इसीप्रकार धमधा विकासखंड में 15.699 मि.घन मी. रूपांकित जलभराव क्षमता के साथ 2022 की स्थिति में जल भराव 9.893 मि.घन मी. एवं 63 प्रतिषत जलभराव आंका गया है।
दुर्ग जिले के दोनों विकासखंडों में जल संसाधन विभाग द्वारा प्राप्त जानकारी के अनुसार शिवनाथ बेसिन, खारून नदी, तांदुला नदी, खरखरा नदी, आमनेर नदी, सुरही नदी एवं लोकल नाला में निर्मित एनिकट स्टॉपडैम के द्वारा सम्बन्धित क्षेत्रों में जलापूर्ति की योजना तैयार की गई है।
दुर्ग विकास खंड के अंतर्गत शहर में नल कनेक्शन जलापूर्ति हेतु अमृत मिशन फेस-1 में काम हुए। जिसमें भागीरथी, वृहदपेयजल,अमृत मिशन इन नामों से जल आपूर्ति हो रही है। अमृत मिशन फेस-1 पूरा हो चुका है जिसके अन्तर्गत फिल्टर प्लांट और 6 एमएलडी क्षमता को बनाए गए। 394 किलोमीटर की पाइप लाइन बिछायी गयी। 12 नई टंकियों का भी निर्माण किया गया है। 242 करोड़ प्रोजेक्ट पर खर्च किए गए है। इसीप्रकार बढ़ती आबादी को ध्यान में रखकर कार्ययोजना बनाई गई है इसके लिए शहर के अंदरूनी इलाकों से लेकर आउटर के वार्ड का सर्वे किया गया। जिसमे ंसे 27 वार्ड का सर्वे किया गया है, जिनमें उन स्थानों को भी चिन्हित किया गया है जहाँ पाइप लाइन उपलब्ध नहीं हुई है। सर्वे के दौरान चार नई पानी टंकियों की जरूरत बतायी, जिसे अमृत मिशन 2.0 के लिए योजनाएं तैयार करने में मदद मिलेंगी। मिशन 2.0 के लिए सर्वे के अनुसार 150 किलोमीटर की नई पाइप लाइन बिछाई जाएगी, 70 करोड़ रु. कार्य के प्रारंभिक लागत तय की गई।
धमधा विकासखंड के अंतर्गत सभी तालाबों का क्षेत्रफल मिला दें तो 100 हेक्टेयर से अधिक है यानी 250 एकड़। यदि हर तालाब में औसत केवल चार फीट पानी भरता है तो भी 250 एकड़ में 4 करोड़ 40 लाख घन फिट पानी एकत्रित होगा। एक घन फिट क्षेत्र में 35 लीटर पानी आता है यानी 154 करोड़लीटर पानी भरने की क्षमता धमधा के तालाबों में है। धमधा की 11 हजार आबादी को पानी पिलाने के लिए रोजाना औसतन 10 लाख लीटर पानी की आपूर्ति की जाती है इनमें बड़ी और छोटी टंकी से 5 लाख और इतना ही शिवनाथ नदी से आता है। महीने भर के 3 करोड़ लीटर पानी की जरूरत पूरे नगर में होती है यानी सालभर में 36 करोड़लीटर। पूरे नगर और खेतों की प्यास बुझाने यहाँ के तालाब और नहरें पर्याप्त है।
जनसंख्या परिवर्तन एवं जीवन स्तर से जल संसाधन में प्रभाव-
समाज की सर्वप्रमुख मांग होती है जलापूर्ति, इन मांगों को पूरा करने के लिए ही जल स्रोतों की क्षमता पर जनसंख्या का प्रभाव जल संसाधनों की गुणवत्ता पर जनसंख्या के प्रभाव को आसानी से देखा जा सकता है। जल का उपयोग करते समय अधिकतर लोग उसके गुणों को नष्ट कर देते हैं। किसी भी कार्य में उपयोग के साथ साथ जल की गुणवत्ता में भी गिरावट आती है। जैसा कि पीने, नहाने और खाना पकाने के लिए घरों में इस्तेमाल किए जाने वाले पानी में किसी भी प्रकार के रासायनिक तत्व उपयोग के दौरान मिलने से जल दूषित हो जाता है। इसी प्रकार फसल की वृद्धि बढ़ाने और खरपतवारों और कीटों को नियंत्रित करने के लिये जिन रसायनों का कृषि सिंचाई में उपयोग होता है वह दूषित जल, जल निकासी के दौरान उन रसायनों को बहा ले जाती है, एवं इसी तरह से उद्योग धंधों मे अपने उत्पादों के निर्माण में उपयोग किये जाने वाले रासायनिक तत्वों से भी जल संसाधन प्रभावित होता है। जिसके कारण यह आने वाली पीढ़ियों के लिए एक चुनौती पैदा कर रही है।
पृथ्वी का विशाल भू- स्थल जलाशयों, नहरों, नदियों, झरनों से विभूषित है, जो सदियों से यहाँ की विशाल जनसंख्या की जल की मांगों को पूरा किया है। जनसंख्या परिवर्तन एवं जीवन स्तर से जल संसाधन में प्रभाव के रूप में जलाशयों की तटीय क्षेत्रों नदियों के तटीय क्षेत्रों के किनारे पर बढ़ते अतिक्रमण ने जल की गुणवत्ता में ह्रास किया है। और कहीं कहीं तो पुरी जलाशय की रुपरेखा ही बदल डाली है। उदाहरण स्वरूप धमधा क्षेत्र को ही ले लेते है जिसके लिए एक कहावत बनी थी “छै आगर छै कोरी तरिया” जिसका अर्थ है वहां के जिस क्षेत्र में नजर दौड़ाएं उधर तालाब नजर आती थी जनसंख्या वृद्धि से आज नगर की ऐतिहासिक विरासत धीरे धीरे खत्म होती जा रही है। एक ओर जहाँ जलाशय के पूर्णूद्धार की योजनाएं चलाई जा रही है वहीं दूसरी ओर अभी भी तालाब को पाटने का क्रम जारी है। धमधा विकासखंड में पठान बावली में सरकारी भवन का निर्माण किया जा रहा है। इन 126 तालाबों में से 121 के अवशेष आज भी नजर आते हैं, लेकिन अस्तित्व में सिर्फ 70 है। उनमें भी तालाब के स्वरूप की बात करें तो मात्र 30 ही बचे हैं। बाकी तालाब जीर्ण अवस्था में हैं। इनमें से कुछ दिनों तक ही पानी इकट्ठा होता है बाकी 56 तालाब अपने अस्तित्व के संकट से जूझ रहा है। इनमें 30 तालाबों को पाटकर लोगों ने अपने खेत बना लिए हैं। गौर करने की बात तो यह है कि आज भी पटवारी रिकार्ड में ये तालाब शासकीय भूमि पर बावली के रूप में दर्ज है। 0.56 हेक्टेयर में फैले श्रीलाल तालाब जिसे पाटकर वहाँ नया बस स्टैंड बना दिया गया है। इसी प्रकार जहाँ 1.82 हेक्टेयर क्षेत्रफल में स्टेडियम बना दिया गया है यह कभी असईया का पैठू तालाब होता था। इसे खेल मैदान बनाने के लिए हजारों ट्रक मिट्टी तीन बार पाटनी पड़ी, तब यह मैदान का रूप ले सका। 0.97 हेक्टेयर में पहले दूदहा तालाब में पहले नगर का अतिरिक्त पानी समाता था। बसाहट के कारण नहर पट गयी तो तालाब में पानी जाने का स्रोत भी बंद हो गया अब सालभर यह सूखा ही रहता है अब यहाँ पार पर कई सामाजिक भवन बन गए हैं। 6.8 एकड़ में फैले बंधवा तालाब व 4.4 एकड़ के राजा तालाब को पाटकर लोगों ने खेत बनाना शुरू कर दिया है। सरकारी रिकॉर्ड के आज भी निस्तार के रूप में दर्ज है। 1.6 हेक्टेयर के तमेर तालाब जिसे 1744 में अदली तमेर ने खुदवाया था, उसे भी पाट कर लोग खेती कर रहे हैं। अभी हाल ही में ढीमर पारा के तालाब जिसेपठान बावली के नाम से जाना जाता है उसे पाटकर दो शासकीय भवनों का निर्माण कर दिया गया। 10 तालाब सिंचाई तालाब के रूप में दर्ज है। उन्हें पाट दिया और खेत बना लिया गया है इसमें हाथी, बूड़ान, भानपुर, बनफरा का पैठू, तेली डबरी-1, डोकरा तालाब, नकटी डबरी, पिपराही तालाब,लोधी तालाब न केवल शासकीय था, बल्कि सिंचाई और निस्तारी तालाब के रूप में भी दर्ज है।
इसी प्रकार दुर्ग विकासखण्ड में “सरोवर हमारी धरोहर” यह बात दुर्ग के लिये बेमानी सी लगती है कहने को तो दुर्ग में 36 तलाब हैं लेकिन इनका पानी पीने लायक तो छोड़ो, नहाने लायक भी नहीं है। चारों ओर गंदगी का ढेर लगा रहता है। पास से निकलो तो बदबू आती है। छठ का त्यौहार या कोई धार्मिक कार्यक्रम यहाँ पूजा करते हैं लेकिन पानी के लिए बाहर से टैंकर मंगवाने पड़ते हैं। तालाबों का पानी इतना गंदा हो गया है कि अब लोग तर्पण, जलांजलि देने से भी कतराते हैं। दुर्ग के निगम हर साल अपने बजट में तालाब के संरक्षण और सौंदर्यीकरण के लिए 1 से 2 करोड़ का प्रावधान रखता है लेकिन इसकी सूरत में कोई सुधार नहीं आता है। शहर के मध्य्में स्थित हरनाबांधा तालाब, मुक्तिधाम के ठीक सामने आज से 20 साल पहले तक तालाब रहा, जो अब पूरी तरह से पट चुका है एक अन्य हिस्से में भी चारों तरफ से कब्जा हो चुका है। कुछ तालाबों में जलकुंभी और गंदगी अटा हुआ है तो कुछ तालाबों के किनारे गोबर के कंडे बनाने के लिए अतिक्रमण किया हुआ है। तालाब के सौंदर्यीकरण पर अब तक 1 करोड़ खर्च हो चुका है। गहरीकरण सौंदर्यीकरण के साथ टर्निंग-वॉल, पाथ-वे, घास, पेड़-पौधे, लाइटिंग की गई। तालाब अब भी बदहाल हैं। लगातार भूजल के स्तर में गिरावट आ रही है, यह बेहद चिंता का विषय है शहर के कुरुद, कोहका, छावनी, घासीदास नगर, कैलाश नगर, फरीदनगर, खम्हरिया, खुर्सीपार सहित ऐसे इलाके हैं जहाँ भूजल का स्तर सामान्य से 50 फीट नीचे पहुँच चुका है। जल संसाधनों की संरक्षण हेतु अस्पतालों में ट्रीटमेंट प्लांट होने के बाद भी गंदा पानी नाली में पहुँच रहा है। यहाँ के सरकारी अस्पतालों से निकलने वाली गंदे पानी को ट्रीटमेंट करने के लिए 1.49 करोड़ की लागत से इटीपी (इन्फ्लुएंसट्रीटमेंट प्लांट) बनाया गया है हाल ही इन प्लांटों को बनाने वाली एजेंसी से हैंडओवर भी ले लिया गया है, इसके बाद भी यहाँ का गंदा पानी बिना ट्रीटमेंट नालियों में बहाया जा रहा है। यह अनुमानित रूप से दुर्ग विकास खंड के 10 अस्पतालों में ट्रीटमेंट प्लांट लगाया गया है इसके बाद भी लापरवाही की जा रही है।
जनसंख्या परिवर्तन एवं जीवन स्तर में जल संसाधन के प्रति लोगों को जागरूकता -
पृथ्वी पर विभिन्न प्रकार के साधन पाए जाते हैं जिनका उपयोग मनुष्य अपनी विभिन्न आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए करता है तब यह साधन संसाधन बन जाते हैं ये संसाधन सीमित मात्रा में उपलब्ध है यदि मनुष्य बुद्धिमत्ता में इन संसाधनों का प्रयोग करें तो वह अपने सभी जरूरतों को पूरा कर सकता है। यदि संसाधनों का दुरुपयोग ना किया जाए तो इसका प्रयोग करके विकास प्रक्रिया को निरंतर जारी रखा जा सकता है। इसका उपयोग करते समय हमें आगे आने वाले पीढ़ी की आवश्यकता को ध्यान में रखना होगा प्राकृतिक संसाधनों का प्रयोग केवल आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए किया जाए ना कि निजी स्वार्थ की पूर्ति के लिए।
जल संसाधन संरक्षण हेतु अस्पतालों से निकलने वाला गंदा पानी को बैक्टीरिया रहित करने वाले प्लांट को इटीपी कहते हैं इसके लिए उनकी पैथोलॉजी, ओटी, सीवर का पानी इससे गुजरना होता है। इस प्लांट से गुजरने के बाद गंदा पानी शुद्ध होकर प्लांट के आगे टैंक में स्टोर होता रहता है। चेक करने के बाद इस पानी का प्रबंधन बागवानी, साफ सफाई में उपयोग कर सकते हैं। इसमें किसी भी प्रकार का बैक्टीरिया नहीं रह जाता है वर्तमान में लगाया गया है प्लांट का उपयोग के लिए जागरूकता की आवश्यकता है।
इसके अतिरिक्त जनसंख्या परिवर्तन व जीवन स्तर में जल जागरूकता और जनता की भागदारी आवश्यक है। जिसके लिए कुछ सुझाव प्रस्तुत हैः-
ऽ आधुनिक कृषि के लिए कृषकों को प्रेरित करना जिससे कम जल में ही फसलें पैदा हो जाए।
ऽ नहरों व पाइप लाइन द्वारा सिंचाई के आधुनिक तकनीकों का प्रयोग। अधिक से अधिक तालाबों की खुदाई करवाना जिससे वर्षा जल संचयन और भूमिगत जल स्तर बढ़ सके।
ऽ कृषि से जैविक खाद का प्रयोग जिससे जल में होने वाले प्रदूषण को रोकने में सहायक हो।
ऽ लोगों को जल की महत्ता समझने की आवश्यकता है जिससे अपने जीवन स्तर में जलसंसाधन का समुचित प्रयोग कर सके एवं भविष्य के लिए भी संरक्षित कर सके।
निष्कर्ष-
अध्ययन क्षेत्र में वर्ष 2014 15 के सन्दर्भ में 2000 से 2011 की जनसंख्या से संबंधित आंकड़े प्राप्त किए गए हैं। जिसका तुलनात्मक अध्ययन स्वरूप 2001 की तुलना वर्ष 2011 में दोनों विकासखंडों में धनात्मक जनसंख्या परिवर्तन देखी गयी है। जिनमें 10 वर्षीय जनसंख्या वृद्धि प्रतिशत के अनुसार दुर्ग विकासखण्ड की तुलना में धमधा विकासखंड में जनसंख्या वृद्धि अधिक हुई है। एवं दोनों विकासखंडों की अन्य जनसांख्यिकीय संबंधी आंकड़े वर्ष 2011 के लिए गए हैं। कहा जाता है कि मनुष्य ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ रचना है। क्योंकि मनुष्य में अन्य प्राणियों की अपेक्षा सोचने समझने की क्षमता अधिक होती है। इसीलिए मनुष्य को सबसे बड़े संसाधान के रूप में जाना जाता है, कोई भी वस्तु तब तक संसाधन नहीं बनेगा जब तक उसे मनुष्य अपने संपर्क में लाकर अपने बुद्धि का प्रयोग करके उसका अपने जीवन में प्रयोग नहीं करेगा।
जनसंख्या एवं उनके जीवन स्तर में जल का प्रत्येक क्षेत्र में प्रयोग होता है। जल संसाधनों की गुणवत्ता में कमी और जनसंख्या में तीव्र वृद्धि के कारण प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता में भारी गिरावट आई है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार वर्तमान में लोगों के दैनिक जरूरतों के लिए होने वाले जल का दोहन सामान्य औसत से ढ़ाई गुना अधिक हो गया है। तेजी से बढ़ती जनसंख्या के कारण जल की प्रति व्यक्ति उपलब्धता दिन प्रतिदिन कम होती जा रही है। साथ ही उपलब्ध जल संसाधन औद्योगिक कृषि और घरेलू प्रयोगों से प्रदुषित होता जा रहा है, जिससे उपयोगी जल संसाधनों की उपलब्धता में कमी होती जा रही है। बढ़ती जनसंख्या ने न केवल जल स्रोत को प्रभावित किया है बल्कि दूसरे प्राकृतिक संसाधनों का भी दुरुपयोग का कारण बन रहा है। अतः जल की चिंताजनक स्थिति तथा इसके निवारण के लिए संरक्षण से सम्बन्धित जागरुकता एवं नई तकनीकों का प्रयोग पर बल दिया जाए।
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Website –
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Received on 21.02.2023 Modified on 09.03.2023 Accepted on 29.03.2023 © A&V Publication all right reserved Int. J. Ad. Social Sciences. 2023; 11(2):106-114. DOI: 10.52711/2454-2679.2023.00016 |